Monday, 14 September 2015

“I object to violence because, when it appears to do good, the good is only temporary; the evil it does is permanent.”



“I object to violence because, when it appears to do good, the good is only temporary; the evil it does is permanent.”
 मुझे हिंसा पर आपत्ति है ; जब यह अच्छा करती हुई प्रतीत होती है, अच्छाई केवल अस्थायी है, इसके द्वारा की गयी बुराई स्थायी है।

प्रकृति सर्वत्र विषमताओं से भरी पड़ी है दार्शनिकों के दर्शन, साहित्यकारों की रचनाओं, मानव के परिवेश से लेकर प्रकृति के स्वयं के स्वरूप में भी विषमता का ही स्पंदन होता है | इसी विषमता के आधार तथा मानवीय संवेगों की चेतना के कारण समय के साथ मानव का अपनी परम्पराओं को दूसरों पर थोपने का प्रयास तो कभी अपनी विचारधारा की मिथ्या प्रवंचना या कभी शक्ति का लोभ उसे हिंसा के मार्ग की और धकेलता आया है, हिंसा का मार्ग कभी कभी बहुत स्वाभाविक तथा आसन भी लगता है क्यूंकि इसमें विवेक अक्सर कहीं खो जाता है और पूरी गुंजाइश होती है की अन्य मानवीय गुण भी लुप्त हो जाएँ |
       हिंसा के मार्ग की पैरवी करने वालों की लम्बी फेहरिस्त रही है | इतिहास हिंसा के रक्त रंजित पन्नों से भरा पड़ा है तो हमें हिंसा के परिमाणों पर विचार करते हुए इसकी प्रासंगिकता पर ज़रूर विचार करना चाहिए |
       हिंसा कई बार अवश्यम्भावी लगती है यह कई बार प्रतिकार के रूप में भी सामने आती है | राम-रावण, कौरव-पांडव से लेकर आधुनिक युद्धों तक कई बार हमें एक पक्ष की न्यायप्रियता को लेकर आश्वस्ति का भाव आता है और प्रतीत होता है की धर्म की रक्षार्थ हिंसा अनिवार्य है किन्तु हिंसा के परिणाम सदैव निरपेक्ष होते हैं | चाहे युद्ध कितने भी बड़े प्रयोजन को लेकर लड़ा गया हो |
       हिंसा के लाभ अक्सर तात्कालिक होते हैं | इसके लाभों में सबसे मुखर है – तात्कालिक शान्ति | दूसरे पक्ष की तात्कालिक शक्तिहीनता ही तात्कालिक शान्ति का मार्ग भी प्रशस्त करती है | जैसा की प्रथम विश्व युद्ध के बाद का जर्मनी का उदाहरण है | हिंसा के बाद कई बार हमें दुर्दांत शासन या प्रतिद्वंदी से मुक्ति भी मिल जाती है | रूस की क्रान्ति के बाद ज़ारशाही का पतन ऐसा ही उदाहरण है | हमारा समकालीन इतिहास ऐसे उदाहरणों से पटा पड़ा है – लीबिया युद्ध, सद्दाम पतन, मिश्र क्रान्ति |
       युद्ध अपने साथ इतनी विभीषिका लाता है की तात्कालिक रूप से मानव हिंसा से घृणा करने लगता है | यह मसला मनुष्य की मनोवृत्ति से जुड़ा हुआ भी है | अक्सर आम जीवन में भी हिंसा से भरे अखबार के पन्ने पलटते हुए हम क्षण भर के लिए विषाद से भर उठते हैं | तात्कालिक रूप से हिंसा से कोई एक पक्ष तो लाभान्वित होता ही है, चाहे हिंसा किसी भी रूप में हो | विश्व युद्ध के समय भी कई देशों की अर्थ व्यवस्थाएं कुलांचें भरने लगी थी | हिंसा कई बार नवाचार का मार्ग प्रशस्त करती है जैसा द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुआ | हिंसा के बाद विजयी पक्ष को कुछ समय के लिए अपने पौरुष का दंभ होने लगता है | इस प्रकार हिंसा के कुछ सकारात्मक पक्ष दिखाई पड़ते हैं किन्तु सिर्फ सतही द्रष्टि से देखने वालों को ही ये नज़र आते हैं थोड़ी सी गहरी द्रष्टि डालने पर साफ़ द्रष्टिगत होता है की उक्त परिणाम सिर्फ तात्कालिक हैं, सिर्फ नवाचार से सम्बद्ध खोजों को छोड़कर किन्तु यह भी महज एक संयोग है वरना नवाचार का हिंसा से कोई सम्बन्ध नहीं है | अतः स्पष्ट है की हिंसा के अगर कुछ लाभ दीखते भी हैं तो सिर्फ तात्कालिक हैं |
       अब इसके नकारात्माक परिणामों पर विचार करते हुए इसकी कालावधि और परिणाम पर विचार करते हैं | हिंसा के बाद जो सबसे स्वाभाविक परिणाम होता है वह है- प्रतिहिंसा | हर हिंसा अपना प्रत्युत्तर प्रतिहिंसा से देती है और वह भी अपने ज्यादा दुर्दांत रूप में | प्रथम विश्व युद्ध की प्रतिक्रिया द्वितीय विश्व युद्ध, इराक युद्ध का परिणाम ISIS | कई बार तो इससे हिंसा का एक आवर्ती चक्र कायम हो जाता है | जो की किसी भी रूप में अच्छा नहीं कहा जा सकता है | हिंसा में हम अपने ज़रूरी संसाधनों का अपव्यय कर देते हैं कई बार हिंसा सिर्फ आवेगों का परिणाम मात्र होती है परन्तु उसके परिणाम चिर काल तक्रहते हैं | क्षण भर में ही हिरोशिमा नागासाकी जैसे हंसते खेलते शहर विनाश की धुल में समाहित हो गए | यह एक ऐसी विनाश लीला थी जिसने पूरे विश्व को झकझोर दिया और जापान की स्वयं की नीतियाँ सदैव के लिए बदल गयी | हिंसा में संसाधनों का प्रभूत पैमाने पर अपव्यय होता है | जो खर्चा देशों को अपने नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य पर करना चाहिए वह खर्च रक्षा सम्बन्धी अपव्यय पर करने लगते हैं | यह महज संयोग नहीं है की जो क्षेत्र युद्ध और हिंसा में उलझे हुए हैं वे ही देश गरीबी और अन्य मानवीय वंचनाओं से भी ग्रसित देश हैं | विडम्बना है की वर्तमान वैश्विक स्वास्थ्य बजट अपने रक्षा बजट का महज 1 फ़ीसदी है |
       हिंसा मानवीय विवेक को घुन लगा देता है | हिंसा पर उतारू मनुष्य स्वयं की हानि पर भी अपने प्रतिद्वंदी की हानि पर आमादा रहता है | वर्ना विवेकशील स्तर पर हिंसा का कोई कारण ही नहीं बनता है | हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार वे होते हैं जो कमज़ोर और वंचित वर्ग के होते हैं, भले ही हिंसा से उनका कोई सरोकार न हो | हिंसा से पीड़ित व्यक्ति के बच्चों और घरवालों को भी एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है | हिंसा से ग्रस्त बालकों पर इसके अप्रतिम प्रभाव पड़ते हैं, उनकी मनोवृत्ति सादा के लिए घृणा से भर उठाती है | घृणा से भरे बचपन की कीमत पूरे समाज को चुकानी पड़ती है | युद्ध के बाद पीड़ित व शोक संसप्त परिवारों की लड़ाई भी कोई युद्ध से कम नहीं होती है | बस वह एक अलग ही मोर्चे पर लड़ी जाती है- संवेदनाओं के मोर्चे पर | 
                हिंसा की वेदी पर सबसे पहले जिसकी बलि चढ़ती है वह है- मानवता |मानव अपनी सारी संवेदनाओं मानवोचित गुणों को ताक पर रख देता है और बाद में अनंत काल के लिए उस पर पश्चाताप करता है, क्यूंकि किसी भी स्तर पर हो या किसी भी रूप में हो हिंसा के परिणामों से कोई भी पक्ष विमुख नहीं हो सकता | संततियों तक को उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं |
       हिंसा के परिणामों की भयावहता तथा परिणामात्मक के कारण ही सभी धर्म, महापुरुष हिंसा के प्रति निषेध रखते आये हैं | बुद्ध ने तो कहा भी है असली विजय वही विजय है जिसमे कोई पराजित नहीं होता | बुद्ध का यहाँ यही आशय है की यदि कोई भी पराजित होता है तो वह एक नयी प्रतिद्वंदिता को जन्म देता है | स्पष्ट है की धर्म की यह बात मनोवैज्ञानिक स्तर पर कही गयी है | गाँधी ने तो हिंसा को मन और वचन के स्तर पर भी निषेध किया है क्यूंकि हिंसा के प्रारम्भिक स्रोत वैचारिक स्तर पर ही होते हैं | इनके परिणामों के बारे में निरंकुश तानाशाह स्टालिन का यह कथन प्रासंगिक है- एक व्यक्ति की मृत्यु दुःख का विषय है परन्तु एक लाख लोगों का मरना एक आंकड़ा है | स्पष्ट है की हिंसा में सबे पहले सबसे बड़े परिमाण पर मानवता मरती है | जिसका कोई मूल्य नहीं है |

Monday, 1 June 2015

Good Fences Make Good Neighbors



   Good Fences Make Good Neighbors

यदि मानव के संक्षिप्त इतिहासवृत पर द्रष्टिपात करें तो यह स्पष्ट हो जाता है की औद्योगिक क्रान्ति के पूर्व तक देशों की सीमाएं परिवर्तित होती रहती थी | लोगों का ध्यान ह्रदय क्षेत्र की तरफ रहता था और सीमाओं का आपेक्षिक महत्त्व कम था, किन्तु धीरे धीरे औद्योगिक क्रान्ति और औपनिवेशीकरण का युग आया तो साम्राजवादी देशों को अपने उपनिवेशों की सुरक्षा हेतु सीमांकन आवश्यक लगा | बाद के काल में संसाधनों के प्रति जागरूकता में वृद्धि हुई तो सीमाएं अत्यधिक महत्वपूर्ण और संवेदनशील हो गई | सीमाएं किन्ही दो देशों के मध्य सेतु का कार्य करती हैं तो क्या अच्छे संबंधों के मूल में सुरक्षित बाडबंदी की हुई सीमा आवश्यक है या यह स्वच्छंद वैचारिक और सांस्कृतिक प्रवाह में अवरोध का कार्य करती है | इन्हीं के आलोक में, देशों के मध्य परस्पर संबंधों की व्याख्या सीमाओं के सन्दर्भ में करने का प्रयास करते हैं |
                सर्वप्रथम सीमाएं किस प्रकार संबंधों में अवरोध का कार्य करती है, इस पर विचार करते हैं | सीमाएं भौतिक अवरोध का कार्य करती है किन्तु जब किसी देश में सामजिक तनाव बढ़ जाते हैं तो सीमाएं कितनी भी मजबूत हों वे अप्रतिम मानवीय दबाव को झेल नहीं पाती | इसी कारण प्रवसन की समस्या उत्पन्न होती है | सीमाएं इनके मानवीय पहलू को नेपथ्य में डाल देती हैं | चाहे वह म्यांमार से प्रवासित हो रहे रोहिंग्या मुस्लिमों की समस्या हो या  अफगान हजारा की या उत्तरी अफ्रीका से द. यूरोप की तरफ प्रवासन कर रहे लोगों की समस्या हो या ऑस्ट्रेलिया की राजनीति में चर्चित रहे ‘बोट पीपुल’ की समस्या हो | यहाँ यह तथ्य रेखांकित करना होगा की जहां सीमाएं इस समस्या के समाधान में असफल रही हैं, वहीँ इससे सम्बंधित देशों के मध्य दुराव बढे हैं | वर्तमान में आसियान देशों के मध्य तनावपूर्ण संबंधों का सबसे प्रमुख कारण रोहिंग्या लोगों की समस्या से निपटने में इनकी अक्षमता रही है | आसियान देशों के संबंधों के स्वर्णिम अध्याय में यह यह काले धब्बे के समान है | इसी प्रकार की समस्या के कारण यूरोपीय यूनियन के देशों के मध्य कटुता की खबरें सुर्ख़ियों में रही हैं |
            सीमाएं सिर्फ भौतिक अवरोध होती हैं यह स्वच्छंद सांस्कृतिक और वैचारिक प्रवाह को बाधित करती है क्यूंकि अक्सर दो देशों के मध्य सीमा पार के लोगों के मध्य सांस्कृतिक सम्बन्ध काफी घनिष्ठ पाए जाते हैं | बंगाल-बांग्लादेश, उत्तर पूर्वी राज्य-म्यांमार, पकिस्तान-अफगानिस्तान और इन सबसे आगे US तथा पश्चिमी यूरोप के मध्य सांस्कृतिक संबंधों के ही कारण तो इनके संबंधों को अतलांतिक की गहराई भी विच्छेदित नहीं कर पाती |
            वर्तमान में जब सुचना क्रान्ति का दौर चल रहा है | सूचनाएं तीव्र गति से आ रही हैं | परिस्थतियाँ तेज़ी से बदल रही हैं | साइबर अपराध बढ़ रहे हैं | वैश्विकरण के दौर में जब व्यापार में WTO जैसी संस्थाओं की महत्ता बढ़ रही है तो सीमाओं की उपादेयता कम हो रही है | यूरोपीय यूनियन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है जहां वे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी सीमाओं को  भुलाकर एक मजबूत पक्ष के रूप में अपनी बात रखते हैं धीर धीरे यही भावना अफ़्रीकी देशों में भी बलवती हो रही है |
      सीमाएं यदि सुरक्षा और अच्छे पडोसी की गारंटी होती तो क्रीमिया विवाद इतना प्रचंड कभी नहीं होता | इसके मूल में यही है की पूर्वी यूरोप के लोगों ने उस भौतिक अवरोध को दिल से कभी नहीं स्वीकार किया | यहाँ गांधीजी की पंक्तियाँ उधत करना समीचीन होगा | विभाजन की त्रासदी के सन्दर्भ में उन्होने कहा था – “यह सिर्फ भौतिक अवरोध है और लोग विभाजन को दिल से इसे कभी न स्वीकारें” | इसी बात को और आगे ले जाते हुए हमारे पूर्व प्रधान मंत्री ने भारत-पाक संबंधों की दिशा में महत्वपूर्ण बात कही – “आओ हम सीमाओं को ही महत्वहीन बना दें, ताकि कम से कम LOC पर तो लोगों का आवागमन स्वच्छंद हो सके” |
      किन्तु इतने मजबूत पक्षों के बावजूद सीमाओं की उपादेयता को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता | यह देशों को सुरक्षा का भाव तो देता ही है | इसी कारण पाक से लोगों के गैर कानूनी प्रवासन की खबरें नहीं सुनाई देती किन्तु बांग्लादेश के सन्दर्भ में तो यह एक बड़ा मुद्दा है इस समस्या का एक प्रमुख कारण यह भी है की भारत-बांग्लादेश सीमाबंदी का पूर्ण न होना और काफी जटिल भौगोलिक सरंचना का होना | भारत जैसे देश जो शंकित पड़ोसियों से घिरे हैं उनके लिए सीमाओं की महत्ता और बढ़ जाती है | वर्तमान में आतंकवाद के साए में सीमाओं की चौकसी और उचित सीमाबंदी एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषयवस्तु है | हाल में भारत-नेपाल सीमा पर दो भिन्न घटनाक्रमों में दो दुर्दांत आतंकवादियों के पकडे जाने से सीमा रुपी अवरोधों की उपादेयता और बढ़ गयी है |
            भारत चीन समस्या के मूल में सीमा की समस्या ही है क्यूंकि हम मेक मोहन रेखा पर इसकी ऐतिहासिकता की वजह से एकमत नहीं हो पा रहे हैं किन्तु यहाँ यह बात उल्लेखनीय है की चीन-म्यांमार ने अपने सीमा विवादों को मेक मोहन रेखा के ही आलोक में सुलझाया है तो यह बात भारत चीन विवाद के समाधान में मेक मोहन रेखा के महत्त्व को और इसके समाधान के मार्ग को प्रशस्त करती है |
      US तथा कनाडा के सीमा संबंधों को अक्सर एक श्रेष्ठ उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता है किन्तु यहाँ मुख्य तथ्य यह है की दोनों देशों के बीच सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्ध हैं सामाजिक, सांस्कृतिक और विकास की समानता जैसे मुद्दे उनकी सीमाओं को सुरक्षित और स्वछंद बनाते हैं | इसके विपरीत US मेक्सिको सीमा तो US में गैर कानूनी तरीके से घुसने का मार्ग बन चुकी है | स्पष्ट है की सीमाओं की स्वछंदता में दोनों देशों की जिम्मेदारी बराबर होती है जिसमें अन्य शक्तियां भी कार्य करती हैं |
            वर्तमान में जब संसाधनों की होड़ मची हुई है | विभिन्न राष्ट्र अधिकाधिक संसाधनों पर नियंत्रण चाहते हैं तो सीमाओं की उपादेयता स्वतः ही बढ़ जाती है अन्यथा दोनों देशों के संबंधों में दुराव उत्पन्न होते हैं | दक्षिण चीन सागर की समस्या का मूल, संसाधनों के नियंत्रण को लेकर ही है | इसी कारण चीन की उस क्षेत्र के सभी पडोसी देशों से कटुता है | जापान और द. कोरिया के संबंधों में भी दुराव का कारण यही है | भारत पाक के बीच सर क्रीक का मुद्दा भी इसी कारण गरमाया रहता है | यदि सीमाओं का उचित सीमांकन होता तो ये समस्या कभी उत्पन्न नहीं होती | इन सब पक्षों के अलावा इस तथ्य का उल्लेख करना आवश्यक है की सुरक्षित सीमाओं के अभाव में अस्थिर देश अपने पडोसी देशों के लिए भी समस्या उत्पन्न करता है | एक अस्थिर पकिस्तान या अफगानिस्तान पूरे क्षेत्र के लिए एक समस्या बन सकता है | उ. कोरिया जैसे राष्ट्र जिन्हें अक्सर ‘ब्लैक होल’ स्टेट कहा जाता है, ऐसे देशों के साथ संबंधों में सुरक्षित सीमाएं काफिर महत्वपूर्ण होती हैं |
            इस प्रकार हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं की सुरक्षित सीमाएं अच्छे पडोसी की गारंटी नहीं होती किन्तु इससे सुरक्षा संबंधी मुद्दों के सम्बन्ध में उनकी प्रमुखता कम नहीं हो जाती | वैसे हमारा अंतिम लक्ष्य सीमाओं को महत्वहीन बनाना ही होना चाहिए और सारी नीतियों और कूटनीतिक बातचीतों के मूल में यही रहना चाहिए | जैसा की भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने कहा है –“भूगोल ने हमें पडोसी, इतिहास ने मित्र, अर्थशास्त्र ने भागीदार तथा आवश्यकता ने सहयोगी बनाया है | जिन्हें भगवान् ने ही इस प्रकार जोड़ा है उनको मनुष्य कैसे अलग कर पायेगा” |


Sunday, 17 May 2015

Political Interference in Bureaucracy – Causes, Consequences and Remedies



Political Interference in Bureaucracy – Causes, Consequences and Remedies
ब्यूरोक्रेसी किसी भी शासन व्यवस्था का अविछिन्न अंग है | मिश्र, जापान और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं में यह किसी न किसी रूप में विद्यमान थी | भारत में इसके सशक्त प्रमाण चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ में मिलते हैं जहां उन्होने आमात्यगण को शासन के आधारभूत आठ स्तंभों में से एक माना | वर्तमान भारतीय ब्यूरोक्रेसी के बीज ब्रिटिश शासन व्यवस्था में विद्यमान हैं | हीगल ने इसको सर्वश्रेष्ठ मष्तिस्क बताते हुए इसके अधिकारों के स्रोत को शक्ति के अंतिम स्रोत दैवीय शक्ति से उधत माना था | भारतीय ब्यूरोक्रेसी को इस्पात का ढांचा कहा गया है | आज विडम्बना है की यह इस्पात का ढांचा स्वयं पर किये जाने वाले प्रहारों से स्वयं को बचाने की कवायद में रत है | शानदार इतिहास और प्रशंसनीय वर्तमान के बाजूद इसमें कमियाँ है, तो इसके कई कारण हैं किन्तु जो कारण सबसे जटिल और गंभीर है, वह है- राजनितिक हस्तक्षेप | हम इसी विषय के कारण, परिणामों और उपायों पर चर्चा करेंगे |
कारण
राजनैतिक हस्तक्षेप के कारणों को हम दो भागों में बाँट सकते हैं |
1) व्यक्तिगत 2) संस्थागत
व्यतिगत स्तर के द्रष्टिकोण से देखें तो राजनैतिक हस्तक्षेप के कारणों में ब्यूरोक्रेट की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा आती है यह पोस्टिंग, स्थानान्तरण, वित्तीय लाभ किसी भी रूप में हो सकती है | ब्यूरोक्रेट का राजनीतिक लीक पर चलना भी इसका एक प्रमुख कारण है | व्यक्तिगत कारण राजनीतिज्ञ पर भी उतने ही लागू होते हैं जहां राजनेता नीति या पद का दुरुपयोग करने का प्रयास करते हैं और चाहे अनचाहे सिविल सेवक इसका हिस्सा बन जाते हैं |
     अब संस्थागत कारणों पर विचार करते हैं | मंत्री नीति निर्धारण करते हैं | लोकतंत्र और सविंधान में उन्हें इसका अधिदेश प्राप्त है किन्तु सचिव को भी अपने अधिकार सविंधान प्रदत्त है | सचिव सवैंधानिक रूप से बाध्य है की वह मंत्री महोदय को किसी भी  नीतिगत मुद्दे पर बिना किसी भेदभाव के तटस्थ रूप से न्यायपूर्ण सलाह दे एक बार सचिव द्वारा सलाह दे दिए जाने पर मंत्री निर्णय लेने को स्वतन्त्र है तथा सचिव उस निर्णय के क्रियान्वयन हेतु बाध्य है जब तक की मंत्री का आचरण अनैतिक या गैर सवैधानिक न हो | यही वह बिंदु है जहां से गतिरोध प्रारम्भ होता है
परिणाम
राजनैतिक हस्तक्षेप के परिणाम काफी व्यापक होते हैं | इसके परिणाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही होते हैं | इस कार्यप्रणाली से नीतिगत निर्णयों में देरी होने लगती है | कई बार भ्रस्ताचार के मामलों में इमानदार सिविल सेवक भी लपेट लिए जाते हैं | जो की सिविल सेवकों की मनोदशा पर नकारात्मक परिणाम डालता है | धीरे धीरे सिविल सेवक ‘निर्णय न लेना ही सबसे अच्छा निर्णय है’ की नीति पर चलने लगता है |
       कई बार जब सिविल सेवक क़ानून और सिविल संहिता का पालन करते हुए निर्णय लेता है तथा जो सत्तारूढ़ सरकार के सामजिक या धार्मिक समीकरणों के सांगत नहीं होता है तो सरकार और संहिताओं का कवच जो सिविल सेवक की रक्षार्थ होता है वह हटा लिया जाता है | इससे भी सिविल सेवकों को एक नकारात्मक सन्देश जाता है |
              यदि इस प्रकार की समस्याएं आती है तो नीतियों के क्रियान्वयन में गंभीर समस्याएं आती हैं और वह व्यक्ति सबसे ज्यादा प्रभावित होता है जिसे उन नीतियों की सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है | इन प्रत्यक्ष परिणामों के इतर अप्रत्यक्ष परिणाम भी कम गंभीर नहीं होते हैं | यदि दो सवैधानिक आधिकारितापूर्ण शक्तियों में गतिरोध उत्पन्न होता है जो स्थान या शक्तियों का जो निर्वात पैदा होता है उसे सविधान से इतर शक्तियां भरने का प्रयास करती है | वह माफिया, अनितिक उद्योगपति आदि किसी भी रूप में हो सकते हैं
उपाय
इस समस्या के कई उपाय हैं , कई उपाय किये भी गए हैं | जैसे प्रशासनिक सुधार आयोग ने स्वीकारा की भारत में सुधारों की शुरुआत राजनीति से होनी चाहिए और चुनाव इसके मूल में है तो चुनाव सुधार ही इस दिशा में पहला कदम होगा | चुनाव सुधार स्वयं एक लम्बी प्रक्रिया है जो अद्यतन जारी है | अंततः चुनाव सुधार ही ईमानदार और निष्कलंक राजनेता का मार्ग प्रशस्त करते हैं | इसके अलावा राजनीतिग्य/मंत्रियों और अधिकारियों को अपने दायित्यों का निर्वहन पूरी इमानदारी से करना चाहिए | मुद्दों और नीतियों में भिन्नता गतिरोध का कारण नहीं बननी चाहिए | सिविल सेवक को भी तथाकथित लाभकारी पोस्टिंग, टफ पोस्टिंग जैसी अवधारणाओं को पूर्णतः त्याग देना चाहिए | सिविल सेवक को सिविल सेवा संहिता, 1964 में अपेक्षित आचरण करना चाहिए
        सिविल सेवक को दिए गए सवैधानिक अधिदेश के ही संगत आचरण करना चाहिए | नीतियाँ जब एक बार चुन ली जाती हैं तो उनके संगत सामाजिक और नीतिगत लक्ष्यों की प्राप्ति मंत्री के कार्यक्षेत्र में आती है, किन्तु इनकी प्राप्ति हेतु मध्यस्थ लक्ष्यों की प्राप्ति जो अंतत सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है वह अधिकारी के कार्यक्षेत्र में आती है | अतः सचिव/अधिकारी को पूर्णतः लगनपूर्वक उनकी प्राप्ति के प्रयास करने चाहिए |
       हालिया सिविल सेवा आचरण सम्बन्धी सुधार जैसे अधिकारी के ट्रान्सफर हेतु सिविल सेवा बोर्ड का गठन, यदि दो वर्ष पूर्व ट्रान्सफर किया जाता है तो स्पष्ट लिखित कारण बाताया जाना, राज्य सरकार से अपेक्षित है | इसके अलावा मौखिक निर्देशों की अनुपालना हेतु सिविल सेवक बाध्य नहीं होगा जब तक की वे लिखित रूप में न हो तो ऐसे कुछ सुधार किये गए हैं ताकि अधिकारी मंत्री को निष्पक्ष सलाह देने को प्रेरित हो तथा अपने दायित्वों का निर्वहन बिना किसी दबाव के करें | इस सम्बन्ध में हाल में भ्रस्ताचार निरोधक क़ानून, 1988 में किये गए संशोधन काफी महत्वपूर्ण है | जिसमे सर्वप्रमुख है रिटायर्ड सिविल सेवकों को भी सीधे कानूनी कार्यवाही से बचाने हेतु, कार्यवाही के पहले सरकार से मंजूरी अपेक्षित करने का प्रावधान है | यह काफी विवाद का विषय है किन्तु तर्कसंगत है जहां नीतियों में इतनी जटिलता और त्वरित निर्णयों की अपेक्षा हो वहाँ यह तय करना काफी मुश्किल होता है की भ्रस्ताचार या पद दुरुपयोग का मामला जानबूझकर किये गए भ्रस्ताचार की श्रेणी में आता है या नीतियों की जटिलता से उत्पन्न समस्या में | अतः निष्ठावान और ईमानदार सिविल सेवकों की रक्षार्थ कानूनों में यथोचित संशोधन अपेक्षित है किन्तु इसका ध्यान रखना आवश्यक है की इसका फायदा भ्रष्ट अधिकारी या भ्रष्ट नेताओं अधिकारियों का गठजोड़ न उठाए |
इस प्रकार जैसा की हमारे प्रधानमन्त्री जी ने कहा है “लोकतंत्र में राजनितिक मध्यस्थता अवश्यम्भावी है और यह होनी भी चाहिए, रचनात्मक मध्यस्थता ही स्वस्थ लोकतंत्र का मार्ग प्रशस्त करती है किन्तु राजनैतिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए” अतः इन दोनों के मध्य की महीन रेखा का सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए और मंत्रियों और अधिकारियों को मिलकर कार्य करना चाहिए | इस सन्दर्भ में ख्यातनाम राजनितिक और सामजिक विज्ञानी रजनी कोठारी की पंक्तिया उधत करना प्रासंगिक होगा –“सिविल सेवाओं ने भारत में शानदार काम किया है, कई मुश्किल हालातों में इनका कार्य प्रशंसनीय है, अपनी कमियों के बावजूद इन्हें अक्षुण बनाने की आवश्यकता है

Sunday, 10 May 2015

You can lead a horse to water, but you can’t make him drink



       You can lead a horse to water, but you can’t make him drink

एक ही विद्यालय में पढने वाले छात्र कालांतर में अलग अलग महाविद्यालयों में जाते हैं | सफलता असफलता प्रदर्शन सभी कुछ में भिन्नता वांछनीय होती है | एक ही समय में ऊद्भवित हुए राष्ट्र कालांतर में विकास के मानदंडों में काफ़ी भिन्नता रखते हैं | नीतियाँ सभी के लिए समान होती हैं, फिर भी कुछ लोग या संगठन ज्यादा तो कुछ कम परिणामोन्मुखी होते हैं | इन सब अंतरों के मूल में परिस्थतियों की भिन्नता होना तो अवश्यम्भावी और अपरिहार्य है किन्तु वह चीज़ जो सभी में साम्य रखती है, वह है- लोग या संगठन अपने पथ प्रदर्शक द्वारा दिखाए गए मार्ग पर किस प्रकार और किस गति से चलते हैं | इसी को अंग्रजी की एक कहावत इस रूप में निरुपित करती है – हम घोड़े को पानी के स्रोत तक ले जा सकते हैं किन्तु उसे ज़बरदस्ती पानी नहीं पिला सकते अंततः पानी तो घोड़े को ही पीना होता है
              विंस्टन चर्चिल द्वितीय विश्व युद्ध के समय अपने ऊत्र्कष्ट भाषणों के माध्यम से राष्ट्र को संबोधित कर रहे होते हैं तब भी अंततः वह उनके सैनिक ही थे उनकी पूरी रणनीति और भावाभिव्यक्ति को असल में अमल में ला रहे होते हैं | महान से महान से नेता भी राष्ट्र को अच्छी दिशा दिखा सकता है किन्तु राष्ट्र को महान उसके नागरिक ही बनाते हैं – महानता से सीधा सा आशय है राष्ट्र के नागरिकों के कृत्य | जर्मनी, जापान जैसे कई देश जो द्वितीय विश्व युद्ध के समय अपना सब कुछ खो चुके थे, यदि वर्तमान में उनके विकास का चित्र मस्तिष्क में उभरता है तो अनायास ही मन उन राष्ट्रों के नागरीकों के प्रति श्रद्धावनत हो जाता है | कोई भी सरकार सिर्फ आधारभूत सरंचना दे सकती है प्रबंधन कर सकती है किन्तु उत्कृष्ट परिणाम तो वहाँ के नागरिक ही देते हैं
       आर्थिक मोर्चों पर इतनी नीतियां बनाई जाती है | 80 के दशक से ही स्व सहायता समूह (SHG) कई नीतियों के केंद्र में रहा है किन्तु धीरे धीरे इनकी कमियाँ द्रष्टिगत हो रही है कई SHG सुलभ ऋण को अच्छे से प्रयोग में नहीं ला पा रहे हैं | धारनीयता (sustainability) के सन्दर्भ में देखें तो वे प्राप्त ऋण से उत्पादक उद्योग नहीं लगा पा रहे हैं | इसी प्रकार RBI मौद्रिक नीति में बदलाव करता है किन्तु अंततः यह बैंकों के विवेक पर ही निर्भर करता है की वे कितना , किस प्रकार और कब उस नीति को जनता के लाभ की दिशा में मोड़ते हैं | हमारे पंचायती राज संस्थाओं को संविधान प्रदत शक्तियों की उपादेयता इसी में अन्तर्निहित है की वे वे उनका उपयोग करते हैं तो किस प्रकार करते हैं |
              अंतर्राष्ट्रीय मोर्चों पर UN जैसी संस्थाएं MDG जैसे कई लक्ष्य निर्धारित करती है किन्तु उनका क्रियान्वयन को राष्ट्र की सरकारों को ही करना होता है | देश जनसँख्या नीति बना सकते हैं, जागरूकता फैला सकते हैं किन्तु अनुपालना तो जनता को ही करनी होती है और अंततः परिणाम भी उसी पर निर्भर करते हैं | जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित सारे वैज्ञानिक प्रेक्षण, IPCC की सारी रिपोर्टें और सारे जलवायु सम्मेलनों का सार यही है की | प्रथ्वी को इस अंधाधुंध दोहन से हम किस प्रकार और कब तक बचायेंगे तो इसके उत्तर के मूल में यही की हम क्या प्रयास करते हैं. यदि प्रयास करते हैं तो कितना प्रभावशाली तरीके से करते हैं |
              सारे धर्म हमें नैतिकता का ही पाठ पढ़ाते हैं किन्तु यह व्यक्ति पर निर्भर करता है की वह उनकी व्याख्या किस प्रकार करता है, उन सिद्धांतों को अमल में लाता भी है क्या | बुद्ध के सिद्धांतों से ऊंगलिमार डाकू भी सन्यासी बन जाता है वही कुछ धर्मांध लोगों पर इसका कोई फर्क नहीं पड़ता | धर्म हमें नैतिकता का पथ दिखा सकते हैं मानवीय जीवन की उपादेयता के सिद्धांत बता सकते है किन्तु यह अंततः हमारे अन्तःकरण पर निर्भर करता है की हम वास्तव में क्या करना चाहते हैं | अन्यमनस्कता से किया गया कोई भी कार्य यथोचित फल नहीं देता है जैसा की छान्दोक्य उपनिषद में लिखा भी है
“वह जो हमारी गहरी अंतःकरण की संवेदना है, वही हमारी इच्छा है, जो हमारी इच्छा है वही हमारा कर्म है और जो हमारा कर्म है वही हमारा भाग्य है”
       वर्तमान दौर में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है | जब हमारे पास सूचनाओं का भण्डार है \ नीतियों का बाहुल्य है | मार्गदर्शकों की कोई कमी नहीं है | प्रश्न वही है क्या हम वास्तव में वह करना चाहते हैं | यदि हमारे अंतःकरण में वह करने की इच्छाशक्ति है तो हम दिखाए गए पथ पर अग्रसित होकर नीतियों को अमली जामा पहना सकेंगे, क्यूंकि वर्तमान में क़ानून का न होना या नीतियों का न होना कोई समस्या नहीं है असल समस्या है उनके क्रियान्वयन में प्रबल इच्छाशक्ति का अभाव | जिस प्रकार नैतिकता के ऊपर कोई क़ानून नहीं बनाया जा सकता उसी प्रकार से सिर्फ नीतिगत बाध्यता से किसी नीति के सही परिणाम दे देने में संशय की पूरी गुंजाइश रहती है |
              इस प्रकार किसी भी नीति या क़ानून या नीति के सन्दर्भ में हमें अपने अन्तः कारन में झांकना होगा | क्या हम सिर्फ भ्रस्ताचार क़ानून चाहते हैं या वास्तव में भ्रस्ताचार मुक्त समाज भी चाहते हैं | ऐसा समाज जिसका हम स्वयं भी अंग होगा जिसमे हम स्वयं भी क़ानून की कमजोरियों को कभी ढाल बनाकर स्वयं के बचाव का प्रयास नहीं करेंगे | क्या गाँव के सरपंच होने के नाते हम वास्तव में चांगे की नरेगा जैसे अगणित सरकारी कार्यक्रम अपने मूल उदेश्य लोक कल्याण को फलीभूत करें | क्या हम वास्तव में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना चाहते हैं | क्या हम वास्तव में लिंग आधारित भेदभाव नहीं करते | इस प्रकार के असंख्य प्रश्नों के उत्तर हमें स्वयं में खोजने होंगे तभी हम अंततः उन सारी नीतियों की सार्थकता सिद्ध कर पायेंगे अन्यथा वे सिर्फ नेमी योजनायें बनकर रह जायेंगी और हम सिर्फ उनकी रस्म अदायगी के निमित्त मात्र