Sunday, 26 April 2015

शब्द दोधारी तलवार से अधिक तीक्ष्ण होते हैं



           Words are sharper than the two-edged sword (शब्द दोधारी तलवार से अधिक तीक्ष्ण होते हैं)
 
आपसी संवाद जीवमात्र की चेतना का प्रतिबिम्ब होता है | जिसे सभी जीव अपने स्तर पर करते हैं, मनुष्य सभी जीवों में परिष्कृत है तो स्वाभाविकतः उसका संवाद का स्तर भी काफी परिमार्जित है | इस संवाद की पूरी प्रक्रिया की आधारभूत कड़ी हमारे शब्द होते हैं जो की हमारे विचारों, मनोभावों के सम्प्रेषण का माध्यम होते हैं | आइये अब शब्दों की इसी जादूगरी पर विचार करते हैं जिनके बारे में अक्सर सुनने को मिलता है की शब्द दोधारी तलवार से ज्यादा तीक्ष्ण होते हैं
       दोधारी तलवार से हमार सीधा सा आशय होता है की जो प्रयोक्ता को उसी परिमाण में हानि करती है जितनी की उस पर, जिस पर की उसका प्रयोग किया जाता है | अक्सर प्रयोक्ता को हुई हानि सापेक्षिक रूप से कहीं ज्यादा होती है तो शब्दों और वाणी के सन्दर्भ में यह कैसे होता है कि बोलने वाला स्वयं ही अपने रचे तीक्ष्ण शब्दों के मायाजाल से आहात हो जाता है | आइये इसे समझने का प्रयास करते हैं
       पहले तो हमें मितभाषी शब्द को समझना होगा जो कम बोलता हो वह शब्दों का चयन भी उचित करे यह कोई आवश्यक नहीं है | जैसा की 500 वर्ष पूर्व रहीम ने कहा -
               “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोये |
                औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए” ||      
                       तो यहाँ वे वाणी की शीतलता पर जोर देते हैं न की मितव्यवता पर किन्तु आश्चर्यजनक रूप से शब्दों के दुधारेपन का शिकार अक्सर वे ही होते हैं जो की अपेक्षाकृत ज्यादा बोलते हैं | इसी सन्दर्भ में गांधी जी के अवलोकन का उल्लेख करना समीचीन होगा जहां ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में वे लिखते हैं “मैं अक्सर कम बोलता था और अपनी बात प्रभावशाली तरीके से नहीं रख पाता था किन्तु दीर्घकाल में मुझे इसका बहुत लाभ हुआ क्यूंकि मुझे कभी अपने कहे हुए का पछतावा नहीं करना पड़ा” यहाँ गांधीजी मितभाषी होने और शब्दों के चयन में सावधानी बरतने, दोनों पर जोर देते हैं |
                                हमारे शास्त्र अनादि काल से ही वाणी के संयम की महत्ता पर जोर देते आये हैं | जैन धर्म में तो वाणी के स्तर पर भी हिंसा का निषेध है | बौद्ध साहित्य में अक्सर ज़िक्र आता है की किस प्रकार कटु वाणी का प्रत्युत्तर बुद्ध गहरी स्मिति से देते थे | सारतः यह कहा जा सकता है की मीठा बोलना श्रेयस्कर है | आखिर कर्णप्रिय संवाद को कौन पसंद नहीं करेगा | इसके तो लाभ ही लाभ हैं तभी तो नक्सलवाद की समस्या से निपटने के लिए गृह मंत्रालय की और से आग्रहपूर्वक CAPF को यह निर्देश दिए गए की वे स्थानीय निवासियों से संवाद कायम करें | किन्तु इन सबके बीच क्या यह कहा जा सकता है की तीक्ष्ण वचन इसी अनुपात में हानि भी कर सकते हैं जिस अनुपात में मीठे बोल लाभकारी होते हैं ? आइये अब इस पर विचार करते हैं की तीक्ष्ण शब्दों के प्रयोग से आखिर हानि क्या होती है |
              सबसे पहले तो तीक्ष्ण बोल हमारे वार्तालाप की तटस्थता समाप्त कर देते हैं | सुनने वाला हमारे मूल मुद्दे पर कम ध्यान देगा और उसके दुसरे आयाम खोजने का प्रयास करेगा | इससे हम कभी सामने वाले तक अपनी बात ठीक प्रकार से नहीं पहुंचा पायेंगे | इसी कारण जनसंपर्क विभाग सदैव ही इस बात पर जोर देते है की हम क्या और कैसे संप्रेषित करते हैं | हमारे क्रोध के तीक्ष्ण उद्गार अक्सर ही हमारी अवचेतना के उद्गार होते हैं और इसके कुछ शब्द ही, संबंधों को सदा के लिए खराब कर सकते हैं क्यूंकि शब्द निरपेक्ष नहीं होते हैं इनमें मानवीय भावनाओं का रस मिला ही होता है कठोर शब्द इन सभी भावनाओं का अतिव्यापन कर लेते हैं | विशेषकर सार्वजनिक जीवन में इसका ध्यान रखा जाना चाहिए | वेनेजुएला के राष्ट्रपति ‘ह्यू चावेज़’ जब UN की महासभा को संबोधित करने गए तो अपने संबोधन में उन्होने तत्कालीन US राष्ट्रपति जोर्ज बुश (जिन्होंने की उनसे ठेक पहले महासभा को संबोधित किया था) के लिए ‘शैतान’ शब्द का प्रयोग किया था और कहा था की उनसे ठीक पहले इस मंच पर एक शैतान आया था | कहना न होगा की चावेज़ की इन दो पंक्तियों ने दोनों देशों के संबंधों को बद से बदतर बनाने में क्या भूमिका निभाई होगी |
              हमारे तीक्ष्ण शब्द हमें बाद में सिर्फ पछताने का ही अवसर देते हैं | उनसे संबंधों में आया दुराव संवाद के स्तर पर ठीक करना काफी दुष्कर कार्य होता है | यह समस्या विकराल रूप इसलिए ले लेती है की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है वह स्वयं में की विलगित इकाई नहीं है | हम जो कहते हैं. उसके परिणामों की जिम्मेदारी भी हमारी स्वयं की ही होती है | यह एक तरह से अधिकार और दायित्व की परंपरा का ही अंग है | जिस प्रकार ज्यादा अधिकार स्वतः ही हम पर अंकुश लगा देते हैं अधिकारों के आलोक में लिए गए निर्णयों की जिम्मेदारी भी हमारी स्वयं की ही होती है | उसी प्रकार तीक्ष्ण शब्द एक प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं जो की किसी भी रूप में हो सकती है और अपने हर स्वरूप में वह खतरनाक होती है | भारत के पूर्व विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने इस सन्दर्भ में सटीक कहा था, जब वे एक राजनयिकों के आख्यान को संबोधित कर रहे थे | उन्होने कहा था “ज़िन्दगी बहुत आसन होती, यदि हमें सिर्फ अपने आप से जूझना पड़ता किन्तु वास्तविक ज़िन्दगी में दुसरे व्यक्तियों से संवाद करना होता है, जूझना होता है, उनके मनोभाव समझने होते हैं” तो निसंदेह इस प्रक्रिया में हमारे शब्दों का चयन बहुत अमोघ औषधि का कार्य करते हैं | वास्तविक जीवन में हम कोई द्वीप नहीं है | हम एक ऐसे गठबंधन का हिस्सा हैं जो कई रूपों में जुड़ा हुआ है |
              हिंदी के प्रसिद्द कवि निराला नै अपनी रचना 'कुकुरमुत्ता' में कुकुरमुत्ता और गुलाब के आपसी संवाद के माध्यम से बड़ी खूबसूरती से दिखाया है की किस प्रकार कुकुरमुत्ता के गलत शब्दों के चयन से उसकी पूरी प्रष्ठभूमि, उसकी व्यग्रता, उसकी कुंठा खुलकर सामने आ जाती है | बिल गेट्स की कंपनी माइक्रोसॉफ्ट जब इन्टरनेट एक्स्प्लोरर बनाती है तो इसकी प्रेरणा उन्हें उन पूर्वगामियों से मिलती है जिन्होंने इन्टरनेट गेटवे में सबसे पहला कदम रखा था और माइक्रोसॉफ्ट पर तंज़ कसे और उसका मज़ाक उड़ाया था | आधुनिक प्रतिस्पर्धी युग में यह सर्वविदित है की जो विचार को सबसे पहले मूर्त रूप देता है वही विजेता होता है किन्तु उन पूर्वगामियों का बडबोलापन ही था की एक ही वर्ष के भीतर वे बाज़ार से बाहर हो गए थे | इसी बडबोलेपन का शिकार हमारे राजनितिग्य अक्सर होते हैं | वे अक्सर भावावेश में कुछ कह देते हैं और बाद में माफ़ी मांगते हैं किन्तु गलत शब्दों के चयन का परिणाम काफी भयावह होता है जो की लम्बे समय तक उनकी छवि का पीछा करता है | आज के इस संचार के दौर में यह और ज्यादा आवश्यक है की हम शब्दों के चयन में सावधानी बरतें क्यूँ की सूचनाएं इतनी तेज़ी से फैलतीं है की बहुत बार हमें अहसास हो उससे पहले शब्द रुपी दोधारी तलवार अपना काम कर चुकी होती है |
                                                                  अतः आवश्यकता है की हम शब्द रुपी खजाने में से ऐसे मुक्तामणि चुनें जिन्हें बिखेरकर हम संवाद की परंपरा को और अधिक मजबूत कर सकें तथा हम आश्वस्त हो पाएं की हमारे शब्द और वाणी किसी भी समस्या के समाधान के पथ को प्रशस्त करेंगे उससे विचलन का कार्य कभी नहीं करें|